
आज शाम
आज शाम, पेड़ की टहनी से एक नन्ही चिड़िया उड़ी। वह उड़कर दूसरी टहनी पर जा बैठी और बोली,
"वाह! यह टहनी कितनी सुंदर है। लकड़ी में हल्की नमी है, पत्ते भी अच्छे से फैले हुए है। इसपर आकर तो बहुत सुकून महसूस होता है।"
इतने में चिड़िया की पुरानी दोस्त, एक गिलहरी पेड़ पर चढ़ी और उस टहनी पर पहुंची। गिलहरी चिड़िया को देख बोली,
"अरे! आज तुम यहां कैसे आगई?"
चिड़िया बोली, "हैना! मुझे भी एकदम नया सा लग रहा है।"
"इस टहनी की बात ही कुछ और है!" कहकर गिलहरी आगे बढ़ने लगी। टहनी आगे से पतली और नाजुक थी, गिलहरी डगमगाती हुई फिसलकर गिर गई। टहनी ऊंची थी, गिलहरी का जीना मुश्किल था। नीचे से गिलहरी को सब दिख रहा था, वह टहनी, वह पेड़। सारी टहनियां एक सी थी, सारे पेड़ भी एक से थे। दूर से सब अच्छा था, बस दूर था। गिलहरी मर गई।
चिड़िया ने नीचे देखा और शोक में डूब गई। रोते रोते वही सो गई। अगले दिन उठी और जमीन पर पहुंची। एक सूखा पत्ता लेकर उसने गिलहरी के शव पर रख दिया और उसे अलविदा कहकर उड़ चली। ऊपर से चिड़िया को सब दिख रहा था, वह टहनी, वह पेड़। सारी टहनियां एक सी थी, सारे पेड़ भी एक से थे। हर कुछ उसे गिलहरी की याद दिलाता। दूर से सब गंदा था, बस दूर था। चिड़िया चली गई।
उड़ते उड़ते वह एक रेगिस्तान में पहुंची। यहाँ न कोई नमी थी, ना कोई पत्तियां, मगर चिड़िया को यहां आकर अच्छा लगने लगा। उसे सुकून महसूस हुआ। चिड़िया वही रहने लग गई। उसे वहां खाना मुश्किल से मिलता, पानी मुश्किल से मिलता, पर वह सह लेती। तड़प उसके सुकून को मिटा न सकी।
कई चिड़िया वहां आती, उसे समझाती कि पास ही में पेड़, वहां चल ले, आराम से रहेगी। चिड़िया मना कर देती, उसे नफरत थी अब पेड़ो से, रेगिस्तान ही उसका घर है।
एक दिन चिड़िया भयंकर प्यास से तड़पी। उसे पानी नहीं मिला। हार कर वह मिट्टी पर लेट गई। ऊपर तेज रूप से सूर्य चमक रहा था। चिड़िया की साँसे धीमी होने लगी थी। उसका बचना मुश्किल था, पर उस अच्छा लग रहा था। उसे खुशी थी कि वह रेगिस्तान में रही। चिड़िया ने मरते मरते सूर्य में गिलहरी को देखा। सूर्य वैसा का वैसा ही था पर चिड़िया को उसे देख खुशी हुई। चिड़िया मर गई।
रेगिस्तान की तेज हवाओं से धूल ने उसके शव को ढक दिया। धीरे धीरे वह मिट्टी में दब गई।




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