गूंगा कवि

मैं शब्दों से शब्दों को जान
शब्दों को ही लिखता हूं
कवि समाज का कलंक मैं
बातें छवि से लिखता हूं

मैंने पढ़ा निर्गुण और बलवान
बरसों पुरानी पोथी से
मैंने लिया सारा धर्म ज्ञान
अक्षरों की ज्योति से

ना मिला किसी पागल से मैं
ना फर्राटेदार लप्पड़ खाई
ना महसूस किया सत्य कभी
बस देखी सबकी परछाई

है अति–विचित्र काल यह
गुणगान मेरा भी होता है
कितना घोर अकाल यहां
एक गूंगा कवियों का वक्ता है

मुझे भी उपमा देनी चाँद की
पर चांद आँखो में उतार कर
बिना बात किए चकोर की
खुद चाँदनी से प्यार कर

मुझे देखनी तारों की लौ
मेरे भीतर आग लगाने को
मुझे बहाने है आंसू धर धर
इतना खुद में खो जाने दो

चाहे मेरी इज़्ज़त लुटे
चाहे मैं मूर्ख कहलाऊं
एक बार यूं लिखदूं तो
खुद को कवि कहपाऊँ

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