महासागर के अंशों

पानी की बूंदें चली पड़ी, कहे समंदर पुकारे हमें,
मैं पूछूं है कौन समंदर, मुझे तो बस बूंदे दिखे।

पत्थर से टकराती बूंदे, मिट्टी में मिल जाती बूंदे,
हवा में ऊंची उठती बूंदें, बूंदो से बतियाती बूंदे।

क्यों इधर को भाग चली, बूंदें जरा बताओ तो,
है अगर सच समंदर, मुझे अंतर दिखलाओ तो।

‘मत कर मत कर यूँ अपमान, वह तुम्हें न छोड़ेगी’
ये कहती है बूंदें मुझसे की लहरें मेरा दम तोड़ेगी!

हाय! ये कैसी विडंबना, फिर कहते है मैं अपमानी हूं!
अगर समंदर है सर्वोच्च, तो लहरें इतनी इंसानी क्यों?

मैं हूं एक निर्लज्ज सामने, यह मुझे सजा सुनाता है!
तुम्हारा सत्य का समंदर, बस इतने से भड़क जाता है?

बूंदों के गुट मुझे न ठुकराओ, हमें एक साथ ही जाना है,
पर क्या समझना भी गलत, कि मेरी मंजिल एक बहाना है?

उठती है लहरें ऊंची, क्योंकि बूंदें उड़ना चाहती है,
मिट्टी में मिलती भी तो क्योंकि बूंदें खिलना चाहती है।

ओ महासागर के अंशों, मैं न कहता तुम हो महान,
पर क्या हर भगवान के पीछे छिपे नहीं है कई इंसान?

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