इक रात

इक रात हक़ीक़त है
मेरे दुखड़ो के जलने की
इक रात इज़ाज़त है
मेरी गलतियों को खुलने की

मैं हो जाऊं मायूस अगर,
क्या सच में रो पाऊंगा?
मैं सोचता हूँ यही भी मगर,
रो–रो कर किधर को जाऊंगा?

बर्बाद हुआ मैं कह देना तुम,
अंदरुनी बातें कौन समझाए?
मैं हंसते हंसते सह लूंगा तम,
जीवन गुमसुम कौन बिताए?

बहकी है सपनों की दुनिया
जाहिल को जाहिल रहने दो
मैं रह चुका हूँ मुसीबत में
मुझे उसी के काबिल रहने दो

इक रात हक़ीक़त है
तारों के तले छिपने की
इक रात इज़ाज़त है
तारों को ढलने की

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