बादल छूने की चाहत में

बादल छूने की चाहत में एक पहाड़ से टकराऊं मैं
ना रुकूं, ना चुकूं, ना कभी घबराऊं मैं

राहें यहां सारी तीतर बीतर, एक किनारे पर फंस जाऊं मैं
धुंध में धस गई आँखें, अब किधर यहां से जाऊं मैं

आधे चढ़े पहाड़ से, जमीन दिखती जरा सी छोटी है
ऊपर फैली बादलों की चादर भी अंदर से खोटी है

ना नीचे ना ऊपर मंजिल, किस तरफ सुकून को पाऊं मैं?
ना बाहर ना भीतर साहिल, किसको क्या समझाऊं मैं?

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