आंखों में समंदर

(1)
एक सवाल की अर्जी थी,
मैं समंदर किनारे जाऊं
एक मेरी मन मर्जी थी,
वहां जाकर डूब जाऊं

मिट्टी में खुद को धसा दूं,
जो हुआ वो भूल जाऊं
लहरों में खुद को गला दूं,
जमीन से बिछड़ जाऊं

मैं नदियों के काबिल था,
मेरे सपनों में साहिल था,
कब एक घर बसाया मैंने?
कब तुमको अपनाया मैंने?

(2)
ठहरा हुआ सा मेरा घर है,
तुम मैं रह लेते इत्मीनान से
मेरी चाहत में जो मंजर है,
उसपर क्यों कोई ध्यान दे

मैं हुआ क्या स्थिर पत्थर सा,
तुम भूल गए मैं हूं शायद भी
अब मैं नहीं रहा पहले जैसा,
तो क्या हूं तुम्हारे लायक भी

मेरे भीतर एक खलल हो उठी
की मेरी काया की परत फूटी
कौन उस घर बुलाया तुमको?
मुझे छोड़ अपनाया किसको?

(3)
बिखरे मेरे शरीर के टुकड़े,
एक सैलाब उमड़ गया
बहता जाए वो घर जिसमें,
कभी था मैं स्थिर पड़ा

न रही कोई आशा मुझमें,
फिर ठहर जाने की
सपनों में से बिछड़ी नदी,
अंत पहुंचकर ही मानेगी

कितने रास्तों को काटकर,
आंखों में समंदर उतार कर,
मैं मिट्टी के सहारे मिल गया
लहरों की गोद में गल गया

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