
आफ़ताब
कैसी यह सूर्य किरणें है?
खिड़की से भीतर आ रही,
कोई इन्हें बताए मैं चोर हूँ,
बेवक्त मुझे क्यों सता रही।
मेरी टेबल पर रोशनी कर
यह क्या दिखाना चाह रही,
हां किताबों पर धूल है क्योंकि
मेरी उनसे बात नहीं हो पा रही।
थोड़ा सामान ही बिखरा हुआ,
इसमें तू क्यों इतना इतरा रही।
तेरा तेज ताप मुझे न दिखा,
मैं इतने से जलता नहीं।
मेरा दिल पत्थर का है सुना!
मेरे ख्वाबों को भी जगह नहीं।
तेरी रोशनी आँखों तक सीमित,
तूने अंधेरा तो अभी देखा नहीं।
मैं रात हूँ, संगीन हूँ।
मेरा लिए कुछ भी नया नहीं।
मैं विरक्त हूँ, स्वाधीन हूँ।
तु मुझसे दृढ़ अब कहां रही।
मेरी साँस साँस विकराल है,
तेरी आभा अब भी वैसी ही।
मेरा रूप गहन सूराख़ है,
तु इसमें क्यों समाती नहीं?
ऐ धूप, मुझे सख्ती न दिखा,
जरूर भीतर तू घबरा रही।
तेरा दंभ चुभने लगा है मुझे,
तु करना क्या है चाह रही?
इस तरफ तेरी हार है,
इस तरफ मेरी जीत ही।
क्या ठाना है तूने ऐसा जो
तेरी साँस हिलती ही नहीं!
तु बचकानी है, नदान है।
तुझमें अभी समझ नहीं।
हाथी से चींटी न लड़े तो
होगा तेरे लिए बेहतर ही।
अभी पर्दे से खिड़की ढक रहा,
मगर निश्चिंत रे, मैं कायर नहीं
तु मिल मुझे फिर सांझ को,
तब देखेंगे किसकी काया बड़ी।
मैं मनुष्य हूं, तू रोशनी,
वैसे भी अपना तुल्य नहीं।
यह मुकाबला बेकार है,
वक्त ज़ाया करे जैसा नहीं।
चल ऐसा कर तू बाहर रह,
मैं टेबल पर जमा दूंगा सही।
आना ना कभी वापिस इधर,
तो किताबों पर होगी धूल नहीं।





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